ऊर्जा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
जबलपुर। मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग द्वारा वर्ष 2026-27 के लिए घोषित बिजली टैरिफ को लेकर प्रदेश में विवाद की स्थिति बन गई है। बिजली मामलों के विशेषज्ञ राजेंद्र अग्रवाल ने डेटा के माध्यम से टैरिफ निर्धारण की प्रक्रिया में गंभीर तकनीकी और वैधानिक खामियों की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार केंद्र सरकार द्वारा कोयले पर दी गई जीएसटी राहत और सस्ती सौर ऊर्जा की सुलभता के बाद भी बिजली दरों में 4.6 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, जो पिछले 5 वर्षों में सर्वाधिक है। विशेष रूप से घरेलू सोलर उपभोक्ताओं के लिए दरों में 7 प्रतिशत का इजाफा किया गया है। जहां अन्य बड़े राज्यों ने अपने टैरिफ में कटौती की है, वहीं मध्य प्रदेश में इसे बढ़ाने का फैसला लिया गया है।
वित्तीय नियमों की अनदेखी और ऑडिट रहित भुगतान
प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक आयोग ने बजट निर्माण के मूलभूत सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए पिछले वर्षों के संशोधित अनुमानों की जगह सीधे आगामी वर्ष के अनुमानित आंकड़ों को आधार बनाया है। मध्य प्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी द्वारा बिजली खरीदी के लिए किए गए 38000 करोड़ रुपये के भुगतान को बिना किसी वैधानिक ऑडिट के हरी झंडी दे दी गई है। इसके अतिरिक्त 20 साल पुराने बिजली खरीदी के अस्वीकृत पूरक बिलों के लिए 3307 करोड़ रुपये की राशि बिना दस्तावेजी प्रमाणों के मंजूर की गई है। साथ ही 2167.45 करोड़ रुपये के पूरक बिल और उस पर देय ब्याज को भी बिना ऑडिट प्रक्रिया के ही स्वीकार कर लिया गया है।
स्मार्ट मीटर और सौर ऊर्जा के नाम पर अतिरिक्त भार
प्रदेश में स्मार्ट मीटर योजना को लेकर भी विरोधाभासी स्थिति निर्मित हुई है। विधानसभा में ऊर्जा मंत्री ने इस योजना को स्व-वित्त पोषित बताया था, किंतु टैरिफ में इसके लिए 1042 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। सौर ऊर्जा की काल्पनिक उपलब्धता दर्शाने से उपभोक्ताओं पर 2500 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा है। इसके अलावा प्रदेश में सरप्लस बिजली होने के बावजूद महंगी खरीदी के कारण जनता पर 3000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आया है। बिजली चोरी के नाम पर औसत खरीदी लागत की गणना के आधार पर भी 600 करोड़ रुपये की वसूली की तैयारी है। विशेषज्ञ के अनुसार विभाग को पुरानी दरों पर ही 4100 करोड़ रुपये की बचत हो रही थी, परंतु आंकड़ों के हेरफेर से घाटा दिखाकर यह नई वृद्धि लागू की गई है।
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