1994 के डबल मर्डर केस में बड़ा फैसला, पूर्व विधायक छोटे सिंह चौहान को जालौन की एमपी-एमएलए कोर्ट ने सुनाई उम्रकैद
जालौन: उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की एमपी-एमएलए कोर्ट ने गुरुवार को 31 साल पुराने डबल मर्डर केस में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने बसपा के पूर्व विधायक छोटे सिंह चौहान को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई और 71 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। यह मामला 30 मई 1994 को चुर्खी थाना क्षेत्र के बिनौरा बैध गांव में प्रधानी चुनाव की रंजिश में हुई दो सगे भाइयों की हत्या से जुड़ा है।
दिनदहाड़े हुई थी हत्या
30 मई 1994 को दोपहर करीब 11:30 बजे रामकुमार अपने भाइयों, परिजनों और ग्रामीणों के साथ अपने मकान के बरामदे में बैठे थे। तभी रुद्रपाल सिंह उर्फ लल्ले गुर्जर, राजा सिंह, संतावन सिंह गुर्जर, करन सिंह उर्फ कल्ले और दो अज्ञात लोग हथियारों से लैस होकर वहां पहुंचे। आरोपियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें राजकुमार उर्फ राजा भैया और जगदीश शरण की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि वीरेंद्र सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। पीड़ित पक्ष की ओर से रामकुमार ने चुर्खी थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी।
कानूनी प्रक्रिया और बसपा से बीजेपी तक का राजनैतिक सफर
पुलिस जांच के दौरान छोटे सिंह चौहान, अखिलेश, कृष्ण मुरारी, बच्चा सिंह और छुन्ना सिंह को भी आरोपी बनाया गया। 18 फरवरी 1995 को जिला एवं सत्र न्यायालय में सुनवाई शुरू हुई। छोटे सिंह को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी। 2007 में वे बसपा से कालपी विधानसभा के विधायक बने, जिसके बाद तत्कालीन बसपा सरकार ने उनके खिलाफ केस वापस ले लिया था। हालांकि, 2021 में छोटे सिंह चौहान बीजेपी में शामिल हो गए और 2022 में निषाद पार्टी के टिकट पर कालपी से चुनाव लड़ा, लेकिन 2816 वोटों से हार गए।
कोर्ट के फैसले से पहले फेसबुक पर दावा
सजा सुनाए जाने से एक दिन पहले, बुधवार को छोटे सिंह चौहान ने फेसबुक पोस्ट में खुद को निर्दोष बताते हुए इसे राजनीतिक षड्यंत्र करार दिया। उन्होंने लिखा, उक्त प्रकरण में मेरी किसी भी प्रकार की संलिप्तता नहीं थी। पर कुछ लोगों को मेरा क्षेत्र में रहना और सबके सुख-दुख में शामिल होना खल रहा था। उन्होंने अपने समर्थकों से कोर्ट में पहुंचने की अपील भी की थी।
सजा के बाद समर्थकों का अभिवादन
कोर्ट द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद, छोटे सिंह चौहान ने कोर्ट से बाहर निकलते समय अपने समर्थकों का हाथ हिलाकर अभिवादन किया। यह मामला 31 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अंतिम फैसले तक पहुंचा, जिसमें अपर सत्र न्यायाधीश भारतेंदु की अदालत ने सबूतों और गवाहों के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया।
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